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स्पेस स्टार्टअप Agnikul Cosmos का धमाका, $500 मिलियन के वैल्यूएशन पर जुटाए $17 मिलियन

स्पेस स्टार्टअप Agnikul Cosmos का धमाका, 0 मिलियन के वैल्यूएशन पर जुटाए  मिलियन

Last Updated on नवम्बर 22, 2025 18:10, अपराह्न by Pawan

चेन्नई की एक स्पेस टेक स्टार्टअप अग्निकुल कॉस्मोस (Agnikul Cosmos) ने आज 22 नवंबर को ऐलान किया है कि इसने करीब $1.7 करोड़ (करीब ₹150 करोड़) जुटाए हैं। स्टार्टअप ने यह फंड करीब $500 मिलियन यानी $50 करोड़ (₹4481 करोड़) के वैल्यूएशन पर जुटाया है। आईआईटी मद्रास में बनी यह स्पेस टेक स्टार्टअप 3डी-प्रिंटेड रॉकेट इंजन्स और स्माल-सैटेलाइट लॉन्च वेइकल्स बनाती है। अभी तक इसने एक सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया है। इसकी यह फंडिंग ऐसे समय में आई है जब भारतीय स्पेस टेक स्टार्टअप और खासतौर से अग्निकुल और स्काईरूट एयरोस्पेस जैसे रॉकेट बनाने वाले स्टार्टअप अपने पहले फुल-स्केल पर लॉन्चेज के लिए तैयारी कर रहे हैं।

HDFC Bank जैसे दिग्गजों ने लिया Agnikul Cosmos के फंडिंग राउंड में हिस्सा

अग्निकुल कॉस्मोस के इस फंडिंग राउंड में फैमिली ऑफिसेज और इंस्टीट्यूशनल इंवेस्टर्स ने हिस्सा लिया जैसे कि एडवेंजा ग्लोबल लिमिटेड (Advenza Global Limited), अथर्व ग्रीन इकोटक एलएलपी (Atharva Green Ecotech LLP), एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank), अर्थ सेलेक्ट फंड (Artha Select Fund), प्रथिथि वेंचर्स (Prathithi Ventures) और 100X.VC। अग्निकुल कॉस्मोस का कहना है कि जुटाई गए पैसों का इस्तेमाल रॉकेट और एयरोस्पेस पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार करने, लॉन्च फ्रीक्वेंसी बढ़ाने और स्टेज-रिकवरी प्रोग्राम को आगे बढ़ाने में किया जाएगा। कंपनी तमिलनाडु में 350 एकड़ का एक इंटीग्रेटेड स्पेस कैंपस भी बना रही है, जिसमें डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और टेस्टिंग फैसिलिटीज एक ही स्थान पर होंगी।

पिछले साल अग्निकुल ने की थी पहली प्राइवेट लॉन्च

अग्निकुल ने पिछले साल पहला प्राइवेट लॉन्च किया था। यह सिंगल पीस 3डी-प्रिंटेड रॉकेट इंजन के इस्तेमाल से इसके खुद के लॉन्चपैड से हुआ था। इसके ग्राहक सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि मिडिल ईस्ट और ऑस्ट्रेलिया में भी हैं। अब इसने जो फंड जुटाया है, उसे लेकर कंपनी का कहना है कि इसे लॉन्च की फ्रीक्वेंसी बढ़ाने में मदद मिलेगी। कंपनी का दावा है कि बढ़ती मांग के बीच एक दर्जन से अधिक ग्राहक इसके साथ लॉन्च करना चाहते हैं। सेलेस्टा कैपिटल का भी कहना है कि धरती की निचली कक्षा में सैटेलाइट्स की भारत समेत दुनिया भर में मांग बढ़ रही है।

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