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FPI Trend: विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली का दौर थमा, दो महीने बाद बने खरीदार, बाजार में झोंके 15,446 करोड़ रुपये

FPI Trend: विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली का दौर थमा, दो महीने बाद बने खरीदार, बाजार में झोंके 15,446 करोड़ रुपये

FPI Trend: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली का सिलसिला दिसंबर महीने में थम गया। FPIs लगातार दो महीने तक (अक्टूबर और नवंबर में) नेट सेलर रहने के बाद दिसंबर में खरीदार बने हैं। बीते महीने FPI ने भारतीय इक्विटी मार्केट में कुल 15,446 करोड़ रुपये ($1.83 बिलियन) का निवेश किया। ब्रोकरेज हाउस बजाज फिनसर्व की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। दिसंबर के पहले 15 दिन FPI बायर्स रहे और इस दौरान खरीदारी गतिविधि मजबूत रही, लेकिन अगले 15 दिनों में बिकवाली का कुछ दबाव देखने को मिला।

FPI ने IT, BFSI, रियल्टी और हेल्थकेयर सेक्टर्स में लगाया पैसा

रिपोर्ट के मुताबिक, आईटी सेक्टर में दिसंबर के दौरान मजबूत डिफेंसिव खरीदारी देखने को मिली, जो गिरते हुए रुपये के खिलाफ एक हेज के रूप में कार्य कर रही थी। विदेशी निवेशकों ने महीने के पहले पखवाड़े (15 दिन) में फाइनैंशियल शेयरों पर भरोसा जताया और खरीदारी की, लेकिन दूसरे पखवाड़े में वह नेट सेलर बन गए। रियल्टी और हेल्थकेयर सेक्टर ने भी अच्छा-खासा निवेश आकर्षित किया, जबकि “अन्य” कैटेगरी में मुख्य रूप से FPI का निवेश IPO में देखने को मिला। कुल मिलाकर, पॉजिटिव फ्लो वाले सेक्टर्स में FPI ने लगभग 37,173 करोड़ रुपये ($4.33 बिलियन) का निवेश किया।

ऑयल एंड गैस और ऑटो शेयरों से FPI ने निकाले पैसे

दिसंबर 2024 में FPI की बिकवाली अपेक्षाकृत कम रही। अधिकांश निकासी ऑयल एंड गैस तथा ऑटोमोबाइल सेक्टर से की गई। इन सेक्टर्स से FPI ने लगभग 21,462 करोड़ रुपये ($2.50 बिलियन) की निकासी की है। हालांकि, इन सेक्टर्स के साथ FMCG सेक्टर में महीने के अंत में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले। जैसे कि ग्रामीण मांग में सुधार के संकेत मिले, और त्योहारी सीजन के कारण दिसंबर में वाहनों की ब्रिकी में तेज वृद्धि हुई। इसके अलावा, आगामी बजट में मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत की उम्मीदों ने उपभोक्ता वस्तुओं के लिए आउटलुक को पॉजिटिव रूप से बदल दिया है

बजट से FPI के रुख में बदलाव की उम्मीद

अगस्त 2024 से विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजारों को लेकर मिला-जुला रहा है, और यह अनिश्चितता समझ में आती है। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, जहां अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 100 बेसिस प्वाइंट की कटौती की है, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी दरों में कोई बदलाव नहीं किया है।

दूसरा, सरकार के वित्तीय अनुशासन पर जोर देने से पूंजीगत खर्च की वृद्धि सीमित हो गई है, जिससे पिछले दो तिमाहियों में जीडीपी वृद्धि प्रभावित हुई है। हालांकि, आगामी केंद्रीय बजट नई उम्मीदें जगा सकता है और FPI के रुख में बड़ा बदलाव ला सकता है।

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