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New labour codes: जोमैटो-स्विगी जैसी कंपनियां बढ़ाएंगी प्लेटफॉर्म फीस? नया लेबर कोड बन सकता है वजह

New labour codes: जोमैटो-स्विगी जैसी कंपनियां बढ़ाएंगी प्लेटफॉर्म फीस? नया लेबर कोड बन सकता है वजह

Last Updated on नवम्बर 25, 2025 20:06, अपराह्न by Pawan

New labour codes: भारत में वर्षों से टल रहे लेबर कोड आखिरकार 21 नवंबर से लागू हो गए। इन नए नियमों का सबसे बड़ा असर गिग इकॉनमी प्लेटफॉर्म्स पर पड़ने वाला है। जैसे कि Swiggy और Zomato। ब्रोकरेज फर्म Kotak Institutional Equities की रिपोर्ट के मुताबिक, इन कंपनियों को अब सरकार की सोशल सिक्योरिटी स्कीम के लिए अपने सालाना टर्नओवर का 1-2% योगदान देना पड़ सकता है।

इस योगदान की अधिकतम सीमा गिग वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान के 5% तक तय की गई है। अगर यह 5% की सीमा लागू होती है, तो कोटक का अनुमान है कि फूड डिलीवरी के हर ऑर्डर पर लगभग 3.2 रुपये और क्विक कॉमर्स ऑर्डर पर लगभग 2.4 रुपये का अतिरिक्त बोझ आएगा।

क्या ग्राहकों पर बोझ डालेंगी कंपनियां?

 

कोटक की रिपोर्ट का कहना है कि यह अतिरिक्त लागत आखिर में ग्राहकों पर ही डाली जाएगी। यानी आने वाले समय में प्लेटफॉर्म फीस बढ़ सकती है या कंपनियां नए चार्ज लगा सकती हैं।

हालांकि प्लेटफॉर्म पहले से ही एक्सीडेंट इंश्योरेंस, हेल्थ इंश्योरेंस, लॉस-ऑफ-पे कवर और मैटरनिटी बेनिफिट जैसी सुविधाएं देते हैं। अगर सरकार चाहती है कि ये सभी बेनिफिट एक केंद्रीय फंड के जरिए दिए जाएं, तो अतिरिक्त लागत घटकर हर ऑर्डर पर लगभग 1-2 रुपये रह सकती है।

वेज कोड से कंपनियों का वेतन खर्च बढ़ सकता है

वेज कोड के मुताबिक केंद्र सरकार अब पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय फ्लोर वेज तय करेगी, यानी ऐसा न्यूनतम वेतन जिसके नीचे कोई भी राज्य मजदूरी नहीं रख सकता। यह वेतन रहने की लागत और कामगारों के कौशल के आधार पर तय होगा। डिलीवरी पार्टनर्स जैसे गिग वर्कर्स पर यह नियम लागू होगा या नहीं, सरकार ने अभी साफ नहीं किया है।

लेकिन अगर राज्य सरकारें इस नए फ्लोर वेज को अपनाती हैं और न्यूनतम वेतन बढ़ाती हैं, तो कंपनियों का कुल वेतन खर्च भी बढ़ जाएगा। इसका सीधा असर कॉरपोरेट सेक्टर की लागत पर पड़ेगा, क्योंकि उन्हें कर्मचारियों और कॉन्ट्रैक्ट स्टाफ दोनों को नए वेतन स्तर के हिसाब से भुगतान करना होगा।

स्टाफिंग कंपनियों के लिए बड़ा मौका

कोटक का मानना है कि TeamLease जैसी संगठित स्टाफिंग कंपनियों को इन लेबर कोड्स से मिड टर्म में बड़ा फायदा मिल सकता है। नए कोड कम्प्लायंस को ज्यादा साफ और सरल बनाते हैं।

इससे कंपनियां अन-ऑर्गनाइज्ड हायरिंग की बजाय अधिक औपचारिक स्टाफिंग प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ सकती हैं। हालांकि यह फायदा कितना और कब मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य सरकारें अपने विस्तृत नियम कितनी जल्दी बनाकर नोटिफाई करती हैं।

इम्प्लीमेंटेशन में कई चुनौतियां बाकी

सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ना निश्चित तौर पर बड़ा सुधार है, लेकिन इसे जमीन पर लागू करना आसान नहीं होगा। गिग वर्कर्स तय शिफ्ट में काम नहीं करते, अक्सर प्लेटफॉर्म बदलते रहते हैं और कई बार एक साथ दो-तीन ऐप पर एक्टिव रहते हैं।

ऐसे में यह तय करना कि कौन-सा वर्कर किस प्लेटफॉर्म से कितना योगदान का हकदार है, सरकार और कंपनियों दोनों के लिए चुनौती बनेगा। इसी वजह से e-Shram डेटाबेस बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि यही डेटा आगे चलकर यह पहचान सुनिश्चित करेगा कि किस वर्कर को कौन-सा बेनिफिट कब और कैसे मिलना चाहिए।

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